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दुर्ग में वाहन बिक्री के नाम पर नियमों की अनदेखी का आरोप, RTO की भूमिका पर उठे सवाल; ‘फोन’ के बाद कार्रवाई रुकने की चर्चा से गरमाया मामला..?

दुर्ग में खुलेआम वाहन बिक्री या नियमों का खेल..? सुराना मोटर्स और साईराम फाइनेंस को लेकर शिकायतें, RTO की कार्रवाई पर सवाल..

दुर्ग// प्रदेश में परिवहन व्यवस्था को नियमों के अनुरूप संचालित करने और मोटर वाहन कानूनों के पालन की जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है। विभाग की आधिकारिक वेबसाइट भी स्पष्ट करती है कि सड़क परिवहन नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करना उसके प्रमुख दायित्वों में शामिल है।

लेकिन दुर्ग जिला मुख्यालय में वाहन बिक्री के नाम पर संचालित बताए जा रहे कुछ प्रतिष्ठानों को लेकर सामने आ रही शिकायतों ने इसी जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि नियमों और आवश्यक वैधानिक अनुमतियों की स्थिति स्पष्ट किए बिना नए वाहनों की बिक्री का कारोबार खुलेआम संचालित हो रहा है, जबकि संबंधित विभाग तक शिकायतें पहुंचने के बावजूद ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है।

सबसे ज्यादा चर्चा ग्रीन चौक स्थित सुराना मोटर्स और सूर्या पैलेस के पास संचालित बताए जा रहे साईराम फाइनेंस को लेकर है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इन स्थानों पर नए वाहनों की बिक्री की जा रही है। यदि यह दावा सही है और संबंधित प्रतिष्ठानों के पास आवश्यक वैधानिक अनुमति अथवा अधिकृत डीलरशिप नहीं है, तो यह जांच का विषय है कि आखिर इतने समय से संबंधित विभाग की नजर इन गतिविधियों पर क्यों नहीं पड़ी..?

RTO की भूमिका पर सीधा सवाल…

दुर्ग के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय से कुछ ही दूरी पर ऐसी गतिविधियां संचालित होने के आरोप सामने आना अपने आप में गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है। शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं होने को लेकर क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी मृत्युंजय पटेल की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।

सवाल यह नहीं कि कार्रवाई हुई या नहीं—सवाल यह है कि यदि शिकायतें विभाग तक पहुंच चुकी हैं तो उनकी जांच का परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं है..?

क्या संबंधित प्रतिष्ठानों के दस्तावेजों की जांच हुई..?

क्या उनकी डीलरशिप अथवा वाहन विक्रय संबंधी अनुमति सत्यापित की गई..?

क्या वहां बिक्री किए जा रहे वाहनों का पंजीयन नियमानुसार हो रहा है..?

और यदि सब कुछ नियमसम्मत है तो विभाग शिकायतकर्ताओं के सामने स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता..?

‘फोन’ से कार्रवाई रुकने की चर्चा—सच क्या है..?

विभागीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आने का दावा किया जा रहा है कि कार्रवाई के लिए टीम निकलती है, लेकिन किसी विधायक प्रतिनिधि के कथित फोन के बाद कार्रवाई रोक दी जाती है।

इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इसे तथ्य नहीं बल्कि जांच योग्य आरोप माना जाना चाहिए। लेकिन यदि वास्तव में किसी जनप्रतिनिधि या उनके प्रतिनिधि द्वारा किसी अधिकारी को कार्रवाई से रोकने का प्रयास किया गया है, तो यह केवल परिवहन विभाग का नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी विषय बन जाता है।

आखिर कार्रवाई किसी कानून के आधार पर होनी है या किसी फोन के आधार पर..?

केदार कश्यप के सुशासन के दावे के बीच दुर्ग से उठता सवाल…

प्रदेश के परिवहन मंत्री केदार कश्यप के विभाग की आधिकारिक जिम्मेदारियों में मोटर वाहन अधिनियम और सड़क परिवहन नियमों का पालन सुनिश्चित करना शामिल है।

ऐसे में दुर्ग जैसे जिला मुख्यालय में यदि नियमविरुद्ध वाहन बिक्री की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तो सवाल स्वाभाविक है कि मैदानी स्तर पर विभागीय निगरानी कितनी प्रभावी है..?

दूसरी ओर, जिस क्षेत्र में ये प्रतिष्ठान संचालित बताए जा रहे हैं, वह दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर के निवास क्षेत्र के नजदीक बताया जा रहा है। ऐसे में स्थानीय जनप्रतिनिधित्व की भूमिका को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

चुनावी राजनीति में ‘अब नई सहिबो, बदल के रहिबो’ जैसे सुशासन के नारों से जनता को व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद दिखाई गई थी। अब यदि उसी व्यवस्था में जिला मुख्यालय पर नियमों के विपरीत गतिविधियां संचालित होने की शिकायतें सामने आती हैं, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि नियमों का राज आखिर जमीन पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा..?

त्योहारी सीजन में असली परीक्षा…

त्योहारी सीजन में वाहनों की बिक्री बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में परिवहन विभाग के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वाहन बिक्री, पंजीयन, डीलरशिप और संबंधित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित हो।

इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या परिवहन विभाग मौके पर जाकर जांच करेगा..?

क्या संबंधित प्रतिष्ठानों के दस्तावेजों की सार्वजनिक रूप से पुष्टि की जाएगी..?

क्या कथित राजनीतिक हस्तक्षेप की शिकायत की जांच होगी..?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या केदार कश्यप के विभाग का ‘सुशासन’ दुर्ग की सड़कों तक पहुंचेगा या फिर नियमों की किताब कार्यालयों में और अवैधता के आरोप सड़कों पर ही दिखाई देते रहेंगे..?

मामले की निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि यहां प्रशासनिक लापरवाही है, नियमों की अनदेखी है, वैध कारोबारी गतिविधि है या किसी बाहरी दबाव की भूमिका। फिलहाल सवाल कई हैं और जवाब परिवहन विभाग तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों को देना है।

Dhanendra Namdev

Editor, IND24tv.com

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