रोहित ऑटो और साईं राम फाइनेंस को लेकर RTO की चुप्पी पर सवाल, क्या जिम्मेदार अधिकारी की निगरानी में चल रहा है पूरा खेल..?
छह महीने से शिकायत, फिर भी कार्रवाई नहीं...?

दुर्ग// शहर में वाहन बिक्री से जुड़े कुछ प्रतिष्ठानों की वैधता और उनके संचालन को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों के बीच क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि रोहित ऑटो, नयापारा दुर्ग और साईं राम फाइनेंस से संबंधित आवश्यक तथ्य एवं दस्तावेज परिवहन विभाग के समक्ष उपलब्ध कराए जा चुके हैं, इसके बावजूद छह महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी अपेक्षित कार्रवाई सामने नहीं आई है।
मामला सिर्फ कार्रवाई नहीं होने तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि जब शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा लगातार मामले को क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी मृत्युंजय प्रसाद पटेल के संज्ञान में लाया गया, तो अब तक विभागीय जांच या स्पष्ट कार्रवाई का नतीजा सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ..?
छत्तीसगढ़ परिवहन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार विभाग मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने तथा सड़क परिवहन नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है। ऐसे में दुर्ग में वाहन बिक्री से जुड़े प्रतिष्ठानों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद कार्रवाई में देरी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
“समय निकालकर कार्रवाई करेंगे” — लेकिन छह महीने बाद भी इंतजार….
शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार इस मामले को लेकर हमारी टीम द्वारा भी क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी से चर्चा की गई थी। बातचीत के दौरान अधिकारी की ओर से समय निकालकर मामले को देखने और कार्रवाई करने की बात कही गई थी। लेकिन शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि इसके बावजूद अब तक कोई ऐसी ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई, जिससे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि आखिर छह महीने से अधिक समय में विभागीय जांच के लिए समय क्यों नहीं निकल पाया..?
यदि प्रतिष्ठानों के दस्तावेज पूरी तरह वैध हैं तो परिवहन विभाग को जांच के बाद स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन लंबे समय तक कार्रवाई लंबित रहने से संदेह और सवाल दोनों बढ़ रहे हैं।
रोहित ऑटो और साईं राम फाइनेंस को लेकर उठे सवाल..
शिकायत में जिन प्रतिष्ठानों का उल्लेख किया गया है, उनमें रोहित ऑटो, नयापारा दुर्ग तथा साईं राम फाइनेंस भिलाई शामिल हैं। उपलब्ध ऑनलाइन कारोबारी जानकारी में रोहित ऑटो को TVS का कंपनी अधिकृत विक्रेता बताया गया है। ऐसे में यदि शिकायत में किसी अन्य प्रकार की अनियमितता, अनुमति, दस्तावेज या संचालन व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं, तो उनका निपटारा केवल आधिकारिक दस्तावेजों और विभागीय जांच के आधार पर ही हो सकता है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या परिवहन विभाग ने शिकायत में लगाए गए आरोपों की विधिवत जांच पूरी की है…? यदि की है तो उसका निष्कर्ष क्या है..? और यदि जांच लंबित है तो छह महीने से अधिक समय लगने का कारण क्या है..?
क्या RTO की चुप्पी सिर्फ प्रशासनिक देरी है या कुछ और..?
शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी और संबंधित प्रतिष्ठानों के बीच कथित संबंधों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, किसी भी कथित मिलीभगत या भ्रष्टाचार की पुष्टि स्वतंत्र जांच और ठोस साक्ष्यों के बिना नहीं की जा सकती।
फिर भी प्रशासनिक पारदर्शिता की दृष्टि से यह जरूरी है कि परिवहन विभाग स्पष्ट करे कि शिकायत पर अब तक क्या जांच हुई, कौन-कौन से दस्तावेजों का परीक्षण किया गया और कार्रवाई में देरी का वास्तविक कारण क्या है।
क्योंकि यदि अधिकारी और प्रतिष्ठान के बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है, तो जांच कर स्थिति स्पष्ट करने में विभाग को कोई संकोच नहीं होना चाहिए। वहीं यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई अपेक्षित है।
त्योहारी सीजन से पहले बड़ा सवाल….
नवरात्रि और त्योहारी सीजन में वाहनों की बिक्री बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में वाहन बिक्री से जुड़े प्रतिष्ठानों की वैधता और नियमों के पालन की जांच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सवाल यह है कि—
क्या RTO दुर्ग शिकायतों पर अब ठोस जांच करेगा..?
क्या संबंधित प्रतिष्ठानों के दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच होगी…?
क्या छह महीने से लंबित शिकायत का विभाग लिखित रूप से जवाब देगा…?
और सबसे अहम—यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो विभाग इसे सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं करता..?
सुशासन के दावे के बीच प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा
राज्य सरकार लगातार सुशासन और जवाबदेह प्रशासन की बात करती रही है। ऐसे में दुर्ग जैसे महत्वपूर्ण जिले में परिवहन विभाग से जुड़ी शिकायत पर लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होने के आरोप प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करते हैं।
हालांकि, इसे सीधे भ्रष्टाचार या मिलीभगत का प्रमाण मानना जांच के निष्कर्ष से पहले उचित नहीं होगा। लेकिन छह महीने से अधिक समय से लंबित शिकायत, उपलब्ध दस्तावेज और अब तक सामने नहीं आई कार्रवाई निश्चित तौर पर विभाग से जवाब मांगने के लिए पर्याप्त सवाल जरूर खड़े करते हैं।
अब देखना होगा कि क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी मृत्युंजय प्रसाद पटेल इस पूरे मामले में कब तक विभागीय जांच और कार्रवाई को आगे बढ़ाते हैं और क्या परिवहन कार्यालय संबंधित प्रतिष्ठानों की वैधता को लेकर स्थिति सार्वजनिक करता है।
क्योंकि सवाल सिर्फ दो प्रतिष्ठानों का नहीं, बल्कि उस सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का है, जिस पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है।



