नेशनल हेराल्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन फुस्स,भीड़ हल्की:– पुलिस इंतज़ाम भारी…


तीन जिला अध्यक्ष, प्रदेश के दिग्गज नेता और फिर भी सन्नाटा, दुर्ग में कांग्रेस का ‘घेराव’ नहीं, महज़ औपचारिकता बनकर रह गया आंदोलन!
दुर्ग// नेशनल हेराल्ड प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी पर “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” का आरोप लगाते हुए प्रदेशव्यापी आंदोलन की घोषणा की थी। इसी क्रम में 18 दिसंबर को दुर्ग जिला भाजपा कार्यालय के घेराव का कार्यक्रम तय किया गया।
आंदोलन से ठीक पहले प्रदेश कांग्रेस ने संगठन को मज़बूती देने के उद्देश्य से नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की थी। दुर्ग जिले में यह जिम्मेदारी दुर्ग ग्रामीण, दुर्ग शहर और भिलाई नगर,तीन जिला अध्यक्षों को सौंपी गई। संगठन और कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि यह पहला जिला स्तरीय आंदोलन नई नियुक्तियों की राजनीतिक क्षमता का प्रदर्शन बनेगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आई।
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व गृह मंत्री ताम्रधर साहू जैसे दिग्गज नेताओं की मौजूदगी के बावजूद दुर्ग भाजपा कार्यालय के सामने जुटी भीड़ करीब 150 लोगों तक सिमट कर रह गई। जिस आंदोलन को लेकर पुलिस प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा इंतज़ाम किए थे, वह भीड़ के लिहाज़ से लगभग असफल साबित हुआ।
यह स्थिति तब और चौंकाने वाली हो जाती है जब यह माना जाए कि तीनों जिला अध्यक्षों के अपने-अपने संगठनात्मक ढांचे मौजूद हैं। यदि केवल संगठन के पदाधिकारी और नामित सदस्य ही पूरी संख्या में शामिल होते, तो भी भीड़ 400–500 तक सहज ही पहुंच सकती थी। इसके अतिरिक्त प्रदेश स्तर के नेताओं के समर्थकों की मौजूदगी से आंदोलन के व्यापक स्वरूप लेने की पूरी संभावना थी, लेकिन वह संभावना कागज़ों से आगे नहीं बढ़ सकी।
इस असफलता ने कांग्रेस संगठन के भीतर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या नए जिला अध्यक्ष संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय कर पाने में सक्षम हैं…?
क्या नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कमी साफ दिखाई देने लगी है..?
या फिर कांग्रेस का आंदोलन अब केवल रणनीति तक सीमित रह गया है, जनसमर्थन से नहीं जुड़ पा रहा…?
यह आंदोलन नए जिला अध्यक्षों की पहली राजनीतिक परीक्षा था, जिसमें अपेक्षित ऊर्जा, संख्या और प्रभाव,तीनों का अभाव साफ नजर आया। विरोध दर्ज तो हुआ, लेकिन वह विरोध वह संदेश नहीं दे सका जिसकी उम्मीद कांग्रेस संगठन और आम जनता दोनों को थी।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस इस संकेत को आत्ममंथन के अवसर के रूप में लेगी, या फिर भविष्य के आंदोलन भी इसी तरह प्रतीकात्मक बनकर रह जाएंगे। दुर्ग का यह घटनाक्रम संगठन की मजबूती से ज़्यादा उसकी कमज़ोर नसों को उजागर करता प्रतीत हो रहा है।



