छत्तीसगढ़दुर्ग जिलादुर्ग शहर

तस्वीरों में चमक, सड़कों पर सन्नाटा: शहर की बदहाली और अलका बाघमार की राजनीति…?

दुर्ग// नगर पालिक निगम के इतिहास में यदि निष्क्रियता, उदासीनता और केवल प्रचार तक सीमित कार्यकाल का कोई उदाहरण गिना जाएगा, तो मौजूदा महापौर अलका बाघमार का नाम शीर्ष पर लिया जाना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। बीते 6 से 8 महीनों के कार्यकाल में शहरी सरकार की मुखिया होने के बावजूद शहर की हालत बद से बदतर होती चली गई, जबकि महापौर की सक्रियता सोशल मीडिया पोस्ट, फोटोसेशन और प्रेस विज्ञप्तियों तक सिमट कर रह गई है।

बड़ी-बड़ी बातें करना, विकास के खोखले दावे करना और ज़मीनी सच्चाई से मुँह मोड़ लेना—यह मौजूदा महापौर की कार्यशैली की पहचान बनती जा रही है। निगम के छोटे कर्मचारियों को आराम, वेतन भुगतान में अनियमितता और आम जनता के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। वहीं पार्षदों के साथ संवाद की जगह कटु शब्दों और असहयोग की चर्चा सत्ता पक्ष के भीतर भी आम हो चुकी है।

सामान्य सभा के फैसले फाइलों में कैद…?

नगर निगम की सामान्य सभा में लिए गए निर्णयों पर अमल न होना अब एक स्थायी प्रवृत्ति बन चुकी है। बस स्टैंड और इंदिरा मार्केट की पार्किंग व्यवस्था में खुलेआम अवैध वसूली की शिकायतें वर्षों से हैं, बावजूद इसके न तो ठोस कार्रवाई होती दिखी और न ही महापौर की ओर से कोई स्पष्ट जवाब सामने आया। चर्चा यह भी है कि इन पार्किंग स्थलों में सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ नेताओं की आर्थिक संलिप्तता बताई जा रही है, जिस पर शहरी सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

अतिक्रमण पर दोहरा रवैया…

शहर भर में अवैध कब्जे लगातार बढ़ रहे हैं। गरीब और कमजोर तबके पर बुलडोज़र चलाने की कार्रवाई तो दिखाई देती है, लेकिन प्रभावशाली और सत्ताधारी दल से जुड़े लोगों के अतिक्रमण पर महापौर की चुप्पी सवालों के घेरे में है। गणेश मंदिर के सामने मुख्य मार्ग पर कब्जे की चर्चा हो या शहर के अन्य प्रमुख स्थान—कार्यवाही केवल “फोटो खिंचवाने” तक सीमित बताई जा रही है।

शहर की पहचान बन चुके स्थल बदहाली के शिकार…..

कभी दुर्ग की शान माने जाने वाले स्थल आज बदहाली की गवाही दे रहे हैं। चौपाटी क्षेत्र की दुर्दशा, सुराना कॉलेज के सामने बदबूदार वातावरण और बुनियादी सुविधाओं का अभाव आम जनता के लिए रोज़मर्रा की परेशानी बन चुका है। सड़कों पर गड्ढों की भरमार है, विकास कार्य ठप पड़े हैं और महिला समूहों से जुड़े कार्यों को समाप्त किए जाने की चर्चा ने सरकार की नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

कपड़ा लाइन, विस्थापन और खोखले आश्वासन…..?

कपड़ा लाइन व्यापारियों को स्थापना और विस्थापन को लेकर केवल आश्वासन दिए गए, लेकिन आज तक कोई ठोस, ज़मीनी पहल नहीं दिखी। “मोर शहर, मोर जिम्मेदारी” जैसे अभियानों की बातें तो खूब की गईं, लेकिन जिम्मेदारी निभाने की इच्छाशक्ति कहीं नजर नहीं आती।

ट्रिपल इंजन में फेल होती शहरी सरकार…?

प्रदेश और देश में एक ही दल की सरकार होने के बावजूद दुर्ग नगर निगम की कार्यप्रणाली “ट्रिपल इंजन सरकार” के दावे को खोखला साबित करती दिख रही है। डबल इंजन की सरकार जहां सफल होने का दावा करती है, वहीं शहरी सरकार की विफलता आम जनता के लिए परेशानी का सबब बन चुकी है।

जनता का गुस्सा—शांत ज्वालामुखी…..

शहर के हर वार्ड, हर चौक-चौराहे पर एक ही सवाल गूंज रहा है– क्या यही था “हमने बनाया, हम सवारेंगे”? महज कुछ महीनों में ही जनता अपने फैसले पर पछताती नजर आ रही है। भीतर ही भीतर जनता का रोष एक शांत ज्वालामुखी की तरह सुलग रहा है, जो कभी भी फूट सकता है।

दुर्ग की शहरी सरकार की मुखिया के रूप में महापौर अलका बाघमार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है–
क्या वे केवल सोशल मीडिया की महापौर बनकर रहेंगी, या ज़मीन पर उतरकर शहर की बदहाली की जिम्मेदारी लेंगी?
फिलहाल तो शहर का आईना यही दिखाता है कि दुर्ग नगर निगम नेतृत्वविहीन और दिशाहीन होता जा रहा है।

Dhanendra Namdev

Editor, IND24tv.com

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