SLRM सेंटर कचरे की आग में, झुलसता भविष्य: क्या महापौर अलका बाघमार करेंगी जवाबदेही तय…?

🔥 शहर के मासूमों के फेफड़ों में ज़हर, और निगम का स्वास्थ्य प्रभारी मौन….?
दुर्ग// शहर की सफाई और जनस्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों दुर्ग शहर सबसे बदतर दौर से गुजर रही है। दुर्ग शहर के हृदय स्थल पर स्थित कचरा संग्रहण केंद्र अब जहरीली गैस का कारखाना बन चुका है, और उसकी कीमत चुका रहे हैं, मासूम बच्चे।
सुराना कॉलेज के सामने स्थित एसएलआरएम केंद्र, जहाँ केवल कचरा संग्रहण होना चाहिए था, वहाँ भारी मात्रा में अवैध कचरा डंपिंग की जा रही है। बीते दिनों यहाँ लगी आग के बाद पिछले चार दिनों से लगातार जहरीला धुआँ आसपास के वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। इस क्षेत्र में स्थित छात्रावासों में रहने वाले सैकड़ों छोटे बच्चे मजबूरी में ज़हर भरी हवा सांसों में भर रहे हैं।
यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सीधा-सीधा जनस्वास्थ्य के साथ अपराध है।
स्वास्थ्य प्रभारी की चुप्पी: लापरवाही या संरक्षण…?
नगर पालिका निगम की सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वही स्वास्थ्य प्रभारी निलेश अग्रवाल इस पूरे मामले पर पूरी तरह मौन हैं।
प्रश्न यह है कि:—
जब छोटे कर्मचारियों की मामूली भूल पर नोटिस, स्थानांतरण और निलंबन हो सकता है
तो फिर सैकड़ों बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाली, इस घोर लापरवाही पर…
👉 स्वास्थ्य प्रभारी के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई…?
पिछले एक वर्ष से शहर भर में कचरे के ढेर, दुर्गंध और गंदगी आम दृश्य बन चुके हैं। सफाई व्यवस्था पूर्व कार्यकाल की तुलना में कहीं अधिक विकराल और बेकाबू हो चुकी है। ऐसे में यह मानने से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस बदहाली की सीधी जिम्मेदारी स्वास्थ्य प्रभारी निलेश अग्रवाल पर भी आती है।
महापौर की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी
शहर की प्रथम नागरिक और शहरी सरकार की प्रमुख अलका बाघमार ने स्वयं, स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी परिषद के निलेश अग्रवाल को सौंपी है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि:–
क्या महापौर की जिम्मेदारी केवल पदभार ग्रहण समारोह और भाषणों तक सीमित है…?
या फिर जनस्वास्थ्य की रक्षा करना भी महापौर की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है..?
यदि प्रभारी पद का आनंद लिया जा सकता है, तो लापरवाही की कीमत भी चुकानी होगी, यही लोकतंत्र और प्रशासन का मूल सिद्धांत है।
🤐 निगम और जिला प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी
इस पूरे गंभीर मामले में नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
क्या यह चुप्पी…
प्रशासनिक नाकामी है…?
या फिर राजनीतिक संरक्षण का परिणाम…?
यदि अब भी कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो यह संदेश जाएगा कि जनता की तकलीफों से शहरी सरकार को कोई सरोकार नहीं।
भाजपा के लिए भी चेतावनी की घंटी…
यदि यही राजनीति और यही कार्यशैली रही, तो आने वाले समय में यह स्थिति भारतीय जनता पार्टी जैसे विश्व के सबसे बड़े संगठन के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।
जनता सवाल पूछ रही है:– क्या शहर की सफाई और बच्चों की सेहत से बड़ा कोई राजनीतिक गणित है..?
अब निगाहें महापौर के फैसले पर
अब देखने वाली बात यह होगी कि….
क्या महापौर अलका बाघमार लापरवाह स्वास्थ्य प्रभारी के विरुद्ध कड़ा और उदाहरणीय कदम उठाती हैं…?
या फिर यह पूरा मामला भी फाइलों और धुएँ के साथ हवा में उड़ जाएगा…?
शहर की जनता, और खासकर मासूम बच्चों के माता-पिता, जवाब चाहते हैं,
आज नहीं तो कब…? और अगर नहीं, तो क्यों…?



