आर.के. जैन के अवैध कब्जों की परछाईं में धीरज बाकलीवाल,अरुण वोरा की सियासी चुप्पी किसानों की जमीन, मंदिर, सरकारी नाला और पचरी घाट सब पर कब्जा! क्या जिला प्रशासन सिर्फ तमाशबीन बना रहेगा…?


दुर्ग// शहर में प्रतिष्ठित व्यापारी की छवि रखने वाले ताराचंद रमेश कुमार जैन (आर.के. जैन/ ट्रांसपोर्ट) पर लगे गंभीर आरोप अब शहर की चौपाल से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक गूंज रहे हैं। आरोप मामूली नहीं,किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा, सरकारी नाले की भूमि हड़पना, मंदिर की जमीन पर बाउंड्री वॉल, और आम जनता के लिए बने सरकारी पचरी घाट पर पक्का भवन। सवाल यह है कि इतने संगीन आरोपों के बाद भी जिला प्रशासन की चुप्पी किसकी ढाल है…?
किसान बनाम ‘कब्जा तंत्र’
किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन पर बाहरी राज्यों के मजदूर बुलवाकर खेती कराई गई और विवादित भूखंड पर बाउंड्री वॉल खड़ी की गई। जब हमारे समाचार समूह ने किसान डोमन सिन्हा की भूमि पर जबरन बाउंड्री वॉल की खबर प्रकाशित की, तो घबराहट में पहले पुरानी दीवार तोड़ी गई,और उसी विवादित स्थान पर नई दीवार खड़ी करने की कोशिश शुरू हो गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रमेश जैन मौके पर नहीं आते, फोन पर निर्देश देते हैं, टकराव किसान और मजदूरों के बीच होता है, जबकि निर्देश देने वाला आलीशान भवन में सुरक्षित रहता है। यह क्या परदे के पीछे से संघर्ष करवाने की रणनीति नहीं…?
पचरी घाट पर ‘कब्जे का महल’
सबसे चौंकाने वाला आरोप सरकारी पचरी घाट से जुड़ा है,जिसका लोकार्पण स्वर्गीय हेमचंद यादव ने किया था। आज उसी सार्वजनिक स्थल पर पक्का भवन खड़ा है। भाजपा शासन में भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं न नोटिस, न सीलिंग, न ध्वस्तीकरण।
यह निष्क्रियता क्या सिर्फ संयोग है…?
सियासत की परतें: बाकलीवाल–वोरा कनेक्शन
सूत्रों के अनुसार, यह निर्माण कांग्रेस शासनकाल में तेज़ी से हुआ। तब तात्कालिक विधायक अरुण वोरा और तात्कालिक महापौर धीरज बाकलीवाल से आर.के. जैन की निकटता जगजाहिर थी। यहाँ तक कि धीरज बाकलीवाल का कार्यालय वर्षों तक आर.के. जैन के भवन में चलने की चर्चाएँ रहीं।
जिस वार्ड में पचरी घाट पर अवैध निर्माण हुआ, वहाँ तात्कालिक पार्षद श्रद्धा सोनी थीं और उनकी राजनीतिक निकटता भी सवालों के घेरे में है। क्या यह सब सामूहिक मौन का सुनियोजित खेल था…?
आवाज़ें उठीं, फिर दब गईं…
भाजपा के युवा नेता ने भी इस मुद्दे को उठाया पर कुछ दिनों में ही आवाज़ मंद पड़ गई। क्या दबाव काम कर गया…? या ‘समझौते’ की राजनीति ने सच को ढक दिया…?
अब निगाहें ‘राजनीतिक वारिस’ पर…
आज बड़ा सवाल जीत हेमचंद यादव पर है,क्या वे स्वर्गीय हेमचंद यादव के नाम से जुड़े पचरी घाट को अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए प्रशासन को कठघरे में खड़ा करेंगे…? या फिर पर्दे के पीछे बैठकें होकर मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा…?
प्रशासन के लिए कसौटी..
क्या स्वतः संज्ञान लेकर नाप-जोख, सीमांकन, सीलिंग और ध्वस्तीकरण होगा…?
क्या मंदिर, नाला और सार्वजनिक भूमि पर कब्जों पर एक्शन प्लान बनेगा…?
या फिर किसी बड़े टकराव/हादसे के बाद ही पुलिस-प्रशासन जागेगा…?
निष्कर्ष:–
यह सिर्फ किसान बनाम व्यापारी का विवाद नहीं,यह कानून बनाम रसूख की परीक्षा है। आम जनता की जमीन, आस्था और सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जे के आरोप अगर यूँ ही दबते रहे, तो संदेश साफ़ है, कानून कमजोर, संपर्क मजबूत।
अब देखना यह है कि दुर्ग में जीत किसकी होती है,आम जनता की या आर.के.जैन के ‘कब्जा तंत्र’ की..?



