भावना बोहरा को मंत्री पद की दौड़ में बढ़त, गजेंद्र यादव गुटबाज़ी में उलझे..?

भावना बोहरा मंत्रिमंडल की दावेदार, जबकि गजेंद्र यादव फिर फंसे ‘गुटबाजी’ के जाल में!
छत्तीसगढ़ की सियासत एक बार फिर करवट ले रही है। राजधानी से मंत्रिमंडल विस्तार की खबरें उड़ान भर रही हैं और साथ ही दो प्रमुख नाम चर्चा में हैं! दुर्ग विधायक गजेंद्र यादव और पंडरिया विधायक भावना बोहरा। लेकिन इस दौड़ में कौन आगे है, ये सिर्फ जातीय संतुलन या पार्टी निष्ठा नहीं, कार्यक्षमता और जनस्वीकार्यता तय करेगी। और यहीं पर गजेंद्र यादव की दावेदारी पर “गुटबाजी” का ग्रहण पड़ता नजर आ रहा है।
गजेंद्र यादव: उड़ान से पहले ही ‘गिरफ्त’ में..?
2023 में भारी बहुमत से विधायक बनने के बाद गजेंद्र यादव से जनता और कार्यकर्ताओं को बड़ी उम्मीदें थीं। परंतु समय के साथ गजेंद्र यादव का संगठन से लगातार दूरी बनाना और उनकी टीम में उन चेहरों का शामिल होना, जो भाजपा की संघर्ष की राह में कहीं दिखाई नहीं दिए, कार्यकर्ताओं को खटकने लगा है।
महापौर चुनाव में 67,000 वोटों से हुई जीत के बाद भी सवाल उठे—जब शहरी निकाय में भाजपा लहर थी तो विधायक को अपेक्षाकृत कम समर्थन क्यों मिला? खुद के गढ़ दुर्ग में विधायक की पकड़ क्यों ढीली पड़ती जा रही है? क्या कारण है कि पार्षदों के बीच भी ‘महापौर-समर्थक’, ‘विधायक-समर्थक’ और ‘दो नावों के सवार’ जैसे वर्ग उभर आए हैं?
इन सब सवालों के बीच, मंत्रिमंडल की दावेदारी में उनका नाम आना बेशक यादव समाज को संदेश देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, परंतु संगठन और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता आज सवालों के घेरे में है।
भावना बोहरा: एक सशक्त विकल्प, जो सिर्फ प्रतिनिधि नहीं, नेतृत्व की प्रतीक हैं!
वहीं दूसरी ओर, पंडरिया विधायक भावना बोहरा की लोकप्रियता की लहर सीमाएं लांघ चुकी है। प्रथम बार विधायक बनीं भावना बोहरा को जिस तरह उत्कृष्ट विधायक सम्मान मिला और जिस तरह वे हर जनहित के मुद्दे पर, चाहे वह विधानसभा का मंच हो या जमीनी जनसंवाद—खुद खड़ी होती रही हैं, वह उन्हें केवल एक विधायिका नहीं बल्कि एक नेत्री के रूप में स्थापित करता है।
भ्रष्टाचार पर मुखर रुख, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर गंभीर पैरवी और प्रशासनिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी—इन सबने भावना बोहरा को प्रदेश सरकार का प्रिय चेहरा बना दिया है। जब राज्य में महिला आरक्षण का मुद्दा गरम है, ऐसे में एक और महिला को मंत्रिमंडल में शामिल करना केवल राजनीतिक समीकरण ही नहीं, सशक्तिकरण का संदेश भी होगा।
गुटबाजी बनाम जनविश्वास: जनता के मन की बात!
सियासत में हर नेता की असली परीक्षा तब होती है जब वह संगठन, जनता और सत्ता—तीनों के बीच संतुलन बना सके। गजेंद्र यादव यदि गुटों की राजनीति में उलझे रहेंगे, तो जनता और संगठन दोनों ही जल्द किनारा कर लेंगे। जबकि भावना बोहरा अपने हर कदम से यह संदेश दे रही हैं कि जब कर्म और संपर्क दोनों हो, तब नेतृत्व स्थायी प्रभाव छोड़ता है।
राज्य की जनता अब जातीय या गुटीय समीकरणों से आगे बढ़कर जनसेवा और प्रभावी नेतृत्व की ओर देख रही है। और इस नजरिए से देखा जाए, तो भावना बोहरा की मंत्रिमंडल में एंट्री एक नैतिक, प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से समय की मांग प्रतीत होती है।
निष्कर्ष:–
जब गुटबाजी नेतृत्व को खोखला करने लगे, तब एक सशक्त, कर्मठ और लोकप्रिय चेहरा ही सरकार और संगठन को मजबूती देता है। छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल में यदि अगली नियुक्ति भावना बोहरा जैसी नेता को मिलती है, तो यह केवल एक सीट की भरपाई नहीं, जनविश्वास की जीत होगी।



